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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 295"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 295

**चौ०** 
> सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥  
> फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥१॥

भावार्थ: देवताओंने सरस्वतीका स्मरण कर उनकी सराहना ( स्तुति ) की और कहा— हे देवि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजीकी बुद्धिको फेर दीजिये। और छलकी छाया कर देवताओंके कुलका पालन ( रक्षा ) कीजिये॥१॥

**चौ०** 
> बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥  
> मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥२॥

भावार्थ: देवताओंकी विनती सुनकर और देवताओंको स्वार्थके वश होनेसे मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं—मुझसे कह रहे हो कि भरतजीकी मति पलट दो! हजार नेत्रोंसे भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!॥२॥

**चौ०** 
> बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥  
> सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥३॥

भावार्थ: ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजीकी बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धिको, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो ( भुलावेमें डाल दो )! अरे! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्यको चुरा सकती है ?॥३॥

**चौ०** 
> भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥  
> अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥४॥

भावार्थ: भरतजीके हृदयमें श्रीसीतारामजीका निवास है। जहाँ सूर्यका प्रकाश है, वहाँ कहीं अँधेरा रह सकता है ? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोकको चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रिमें चकवा व्याकुल होता है॥४॥

**दो०** 
> सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।  
> रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥२९५॥

भावार्थ: मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाह करके बुरा ठाट ( षड्‌यन्त्र ) रचा। प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया॥२९५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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