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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 294"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 294

श्रीराम-भरत-संवाद

**चौ०** 
> भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥  
> सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥१॥

भावार्थ: भरतजीके वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे। भरतजीके वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं। उनमें अक्षर थोड़े हैं, परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है॥१॥

**चौ०** 
> ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अद्भुत बानी॥  
> भूप भरतु मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥२॥

भावार्थ: जैसे मुख [ का प्रतिबिम्ब ] दर्पणमें दीखता है और दर्पण अपने हाथमें है, फिर भी वह ( मुखका प्रतिबिम्ब ) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजीकी यह अद्भुत वाणी भी पकड़में नहीं आती ( शब्दोंसे उसका आशय समझमें नहीं आता )। [ किसीसे कुछ उत्तर देते नहीं बना ] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाजके साथ वहाँ गये जहाँ देवतारूपी कुमुदोंके खिलानेवाले ( सुख देनेवाले ) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे॥२॥

**चौ०** 
> सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥  
> देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥३॥

भावार्थ: यह समाचार सुनकर सब लोग सोचसे व्याकुल हो गये; जैसे नये ( पहली वर्षाके ) जलके संयोगसे मछलियाँ व्याकुल होती हैं। देवताओंने पहले कुलगुरु वसिष्ठजीकी [ प्रेमविह्वल ] दशा देखी, फिर विदेहजीके विशेष स्नेहको देखा;॥३॥

**चौ०** 
> राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥  
> सब कोउ राम पेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा॥४॥

भावार्थ: और तब श्रीरामभक्तिसे ओतप्रोत भरतजीको देखा। इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदयमें हार मान गये ( निराश हो गये )। उन्होंने सब किसीको श्रीरामप्रेममें सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोचके वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं॥४॥

**दो०** 
> रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु।  
> रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥२९४॥

भावार्थ: देवराज इन्द्र सोचमें भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह और संकोचके वशमें हैं। इसलिये सब लोग मिलकर कुछ प्रपञ्च ( माया ) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा [ ही समझो ]॥२९४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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