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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 293"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 293

**चौ०** 
> सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥  
> प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥१॥

भावार्थ: भरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रोंमें जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले—हे प्रभो! आप हमारे पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुलगुरु श्रीवसिष्ठजीके समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं॥१॥

**चौ०** 
> कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू॥  
> सिसु सेवकु आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी॥२॥

भावार्थ: विश्वामित्रजी आदि मुनियों और मन्त्रियोंका समाज है। और आजके दिन ज्ञानके समुद्र आप भी उपस्थित हैं। हे स्वामी! मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञानुसार चलनेवाला समझकर शिक्षा दीजिये॥२॥

**चौ०** 
> एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥  
> छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता॥३॥

भावार्थ: इस समाज और [ पुण्य ] स्थलमें आप [ जैसे ज्ञानी और पूज्य ] का पूछना! इसपर यदि मैं मौन रहता हूँ तो मलिन समझा जाऊँगा; और बोलना पागलपन होगा तथापि मैं छोटे मुँह बड़ी बात कहता हूँ। हे तात! विधाताको प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजियेगा॥३॥

**चौ०** 
> आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥  
> स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥४॥

भावार्थ: वेद, शास्त्र और पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत्‌ जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामिधर्ममें ( स्वामीके प्रति कर्तव्यपालनमें ) और स्वार्थमें विरोध है ( दोनों एक साथ नहीं निभ सकते )। वैर अंधा होता है और प्रेमको ज्ञान नहीं रहता [ मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनोंमें ही भूल होनेका भय है ]॥४॥

**दो०** 
> राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।  
> सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि॥२९३॥

भावार्थ: अतएव मुझे पराधीन जानकर ( मुझसे न पूछकर ) श्रीरामचन्द्रजीके रुख ( रुचि ), धर्म और [ सत्यके ] व्रतको रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिये हितकारी हो आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिये॥२९३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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