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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 292"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 292

**चौ०** 
> सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥  
> सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥१॥

भावार्थ: मुनि वसिष्ठजीके वचन सुनकर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्यको भी वैराग्य हो गया ( अर्थात्‌ उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये )। वे प्रेमसे शिथिल हो गये और मनमें विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया॥१॥

**चौ०** 
> रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥  
> हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥२॥

भावार्थ: राजा दशरथजीने श्रीरामजीको वन जानेके लिये कहा और स्वयं अपने प्रियके प्रेमको प्रमाणित ( सच्चा ) कर दिया ( प्रियवियोगमें प्राण त्याग दिये )। परन्तु हम अब इन्हें वनसे [ और गहन ] वनको भेजकर अपने विवेककी बड़ाईमें आनन्दित होते हुए लौटेंगे [ कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजीको वनमें छोड़कर चले आये, दशरथजीकी तरह मरे नहीं! ]॥२॥

**चौ०** 
> तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी॥  
> समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा॥३॥

भावार्थ: तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सब सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये। समयका विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरतजीके पास चले॥३॥

**चौ०** 
> भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥  
> तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥४॥

भावार्थ: भरतजीने आकर उन्हें आगे होकर लिया ( सामने आकर उनका स्वागत किया ) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये। तिरहुतराज जनकजी कहने लगे—हे तात भरत! तुमको श्रीरामजीका स्वभाव मालूम ही है॥४॥

**दो०** 
> राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।  
> संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु॥२९२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और स्नेह रखनेवाले हैं। इसीलिये वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाय॥२९२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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