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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 291"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 291

जनक-वसिष्ठादि-संवाद,इन्द्रकी चिन्ता,सरस्वतीका इन्द्रको समझाना

**चौ०** 
> सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ । जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥  
> जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू । जहँ नहिं राम पेम परधानू॥१॥

भावार्थ: जहाँ श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय। जिसमें श्रीरामप्रेमकी प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है॥१॥

**चौ०** 
> तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं । तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं॥  
> राउर आयसु सिर सबही कें । बिदित कृपालहि गति सब नीकें॥२॥

भावार्थ: तुम्हारे बिना ही सब दुःखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हींसे सुखी हैं। जिस किसीके जीमें जो कुछ है तुम सब जानते हो। आपकी आज्ञा सभीके सिरपर है। कृपालु ( आप ) को सभीकी स्थिति अच्छी तरह मालूम है॥२॥

**चौ०** 
> आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥  
> करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥३॥

भावार्थ: अतः आप आश्रमको पधारिये। इतना कह मुनिराज स्नेहसे शिथिल हो गये। तब श्रीरामजी प्रणाम करके चले गये और ऋषि वसिष्ठजी धीरज धरकर जनकजीके पास आये॥३॥

**चौ०** 
> राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए॥  
> महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥४॥

भावार्थ: गुरुजीने श्रीरामचन्द्रजीके शील और स्नेहसे युक्त स्वभावसे ही सुन्दर वचन राजा जनकजीको सुनाये [ और कहा— ] हे महाराज! अब वही कीजिये जिसमें सबका धर्मसहित हित हो॥४॥

**दो०** 
> ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।  
> तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥२९१॥

भावार्थ: हे राजन्! तुम ज्ञानके भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्ममें धीर हो। इस समय तुम्हारे बिना इस दुविधाको दूर करनेमें और कौन समर्थ है?॥२९१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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