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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 290"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 290

**चौ०** 
> राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती॥  
> राज समाज प्रात जुग जागे । न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥१॥

भावार्थ: श्रीरामजी और भरतजीके गुणोंकी प्रेमपूर्वक गणना करते ( कहते-सुनते ) पति-पत्नीको रात पलकके समान बीत गयी। प्रातःकाल दोनों राजसमाज जागे और नहा-नहाकर देवताओंकी पूजा करने लगे॥१॥

**चौ०** 
> गे नहाइ गुर पहिं रघुराई । बंदि चरन बोले रुख पाई॥  
> नाथ भरतु पुरजन महतारी । सोक बिकल बनबास दुखारी॥२॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजीके पास गये और चरणोंकी वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले—हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएँ, सब शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुःखी हैं॥२॥

**चौ०** 
> सहित समाज राउ मिथिलेसू । बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥  
> उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा । हित सबही कर रौरें हाथा॥३॥

भावार्थ: मिथिलापति राजा जनकजीको भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये। इसलिये हे नाथ! जो उचित हो वही कीजिये। आपहीके हाथ सभीका हित है॥३॥

**चौ०** 
> अस कहि अति सकुचे रघुराऊ । मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥  
> तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा । नरक सरिस दुहु राज समाजा॥४॥

भावार्थ: ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका शील-स्वभाव देखकर [ प्रेम और आनन्दसे ] मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गये। [ उन्होंने खुलकर कहा— ] हे राम! तुम्हारे बिना [ घर-बार आदि ] सम्पूर्ण सुखोंके साज दोनों राजसमाजोंको नरकके समान हैं॥४॥

**दो०** 
> प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।  
> तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥२९०॥

भावार्थ: हे राम! तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माके भी आत्मा और सुखके भी सुख हो। हे तात! तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है॥२९०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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