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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 29"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 29

**चौ०** 
> सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥  
> मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥१॥

भावार्थ: [ वह बोली— ] हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥  
> सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥२॥

भावार्थ: तपस्वियोंके वेषमें विशेष उदासीन भावसे ( राज्य और कुटुम्ब आदिकी ओरसे भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियोंकी भाँति ) राम चौदह वर्षतक वनमें निवास करें। कैकेयीके कोमल ( विनययुक्त ) वचन सुनकर राजाके हृदयमें ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे चकवा विकल हो जाता है॥ २ ॥

**चौ०** 
> गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥  
> बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥३॥

भावार्थ: राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वनमें बटेरपर झपटा हो। राजाका रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़के पेड़को बिजलीने मारा हो ( जैसे ताड़के पेड़पर बिजली गिरनेसे वह झुलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> माथें हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥  
> मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥४॥

भावार्थ: माथेपर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात्‌ सोच ही शरीर धारणकर सोच कर रहा हो। [ वे सोचते हैं— हाय! ] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयीने हथिनीकी तरह उसे जड़समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला॥ ४ ॥

**चौ०** 
> अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हिसि अचल बिपति कै नेईं॥५॥

भावार्थ: कैकेयीने अयोध्याको उजाड़ कर दिया और विपत्तिकी अचल ( सुदृढ़ ) नींव डाल दी॥ ५ ॥

**दो०** 
> कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।  
> जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥२९॥

भावार्थ: किस अवसरपर क्या हो गया! स्त्रीका विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योगकी सिद्धिरूपी फल मिलनेके समय योगीको अविद्या नष्ट कर देती है॥ २९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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