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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 288"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 288

**चौ०** 
> सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू । सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥  
> मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥१॥

भावार्थ: सोनेमें सुगंध और [ समुद्रसे निकली हुई ] सुधामें चन्द्रमाके सार अमृतके समान भरतजीका व्यवहार सुनकर राजाने [ प्रेमविह्वल होकर ] अपने [ प्रेमाश्रुओंके ] जलसे भरे नेत्रोंको मूँद लिया ( वे भरतजीके प्रेममें मानो ध्यानस्थ हो गये )। वे शरीरसे पुलकित हो गये और मनमें आनन्दित होकर भरतजीके सुन्दर यशकी सराहना करने लगे॥१॥

**चौ०** 
> सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥  
> धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥२॥

भावार्थ: [ वे बोले— ] हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजीकी कथा संसारके बन्धनसे छुड़ानेवाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार—इन तीनों विषयोंमें अपनी बुद्धिके अनुसार मेरी [ थोड़ी-बहुत ] गति है ( अर्थात्‌ इनके सम्बन्धमें मैं कुछ जानता हूँ )॥२॥

**चौ०** 
> सो मति मोरि भरत महिमाही । कहै काह छलि छुअति न छाँही॥  
> बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥३॥

भावार्थ: वह ( धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञानमें प्रवेश रखनेवाली ) मेरी बुद्धि भरतजीकी महिमाका वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छायातकको नहीं छू पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान्— ॥३॥

**चौ०** 
> भरत चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन बिमल बिभूती॥  
> समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥४॥

भावार्थ: सब किसीको भरतजीके चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझनेमें और सुननेमें सुख देनेवाले हैं और पवित्रतामें गङ्गाजीका तथा स्वाद ( मधुरता ) में अमृतका भी तिरस्कार करनेवाले हैं॥४॥

**दो०** 
> निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।  
> कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥२८८॥

भावार्थ: भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजीके समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वतको क्या सेरके बराबर कह सकते हैं? इसलिये ( उन्हें किसी पुरुषके साथ उपमा देनेमें ) कविसमाजकी बुद्धि भी सकुचा गयी!॥२८८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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