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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 287"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 287

जनक-सुनयना-संवाद,भरतजीकी महिमा

**चौ०** 
> तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥  
> पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥१॥

भावार्थ: सीताजीको तपस्विनी-वेषमें देखकर जनकजीको विशेष प्रेम और सन्तोष हुआ। [ उन्होंने कहा— ] बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये। तेरे निर्मल यशसे सारा जगत्‌ उज्ज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥  
> गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥२॥

भावार्थ: तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गङ्गाजीको भी जीतकर [ जो एक ही ब्रह्माण्डमें बहती है ] करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें बह चली है। गङ्गाजीने तो पृथ्वीपर तीन ही स्थानों ( हरिद्वार, प्रयागराज और गङ्गासागर ) को बड़ा ( तीर्थ ) बनाया है। पर तेरी इस कीर्तिनदीने तो अनेकों संतसमाजरूपी तीर्थस्थान बना दिये हैं॥२॥

**चौ०** 
> पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी । सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥  
> पुनि पितु मातु लीन्हि उर लाई । सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥३॥

भावार्थ: पिता जनकजीने तो स्नेहसे सच्ची सुन्दर वाणी कही। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोचमें समा गयीं। पिता-माताने उन्हें फिर हृदयसे लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशिष दी॥३॥

**चौ०** 
> कहति न सीय सकुचि मन माहीं । इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥  
> लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥४॥

भावार्थ: सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु मनमें सकुचा रही हैं कि रातमें [ सासुओंकी सेवा छोड़कर ] यहाँ रहना अच्छा नहीं है। रानी सुनयनाजीने जानकीजीका रुख देखकर ( उनके मनकी बात समझकर ) राजा जनकजीको जना दिया। तब दोनों अपने हृदयोंमें सीताजीके शील और स्वभावकी सराहना करने लगे॥४॥

**दो०** 
> बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि।  
> कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥२८७॥

भावार्थ: राजा-रानीने बार-बार मिलकर और हृदयसे लगाकर तथा सम्मान करके सीताजीको विदा किया। चतुर रानीने समय पाकर राजासे सुन्दर वाणीमें भरतजीकी दशाका वर्णन किया॥२८७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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