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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 284"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 284

**चौ०** 
> रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई॥  
> रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन॥१॥

भावार्थ: हे रानी! मौका पाकर आप राजाको अपनी ओरसे जहाँतक हो सके समझाकर कहियेगा कि लक्ष्मणको घर रख लिया जाय और भरत वनको जायँ। यदि यह राय राजाके मनमें [ ठीक ] जँच जाय, ॥ १ ॥

**चौ०** 
> तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥  
> गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥२॥

भावार्थ: तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरतका अत्यधिक सोच है। भरतके मनमें गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहनेमें मुझे भलाई नहीं जान पड़ती ( यह डर लगता है कि उनके प्राणोंको कोई भय न हो जाय )॥ २ ॥

**चौ०** 
> लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥  
> नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥३॥

भावार्थ: कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणीको सुनकर सब रानियाँ करुणरसमें निमग्न हो गयीं। आकाशसे पुष्पवर्षाकी झड़ी लग गयी और धन्य-धन्यकी ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि स्नेहसे शिथिल हो गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥  
> देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥४॥

भावार्थ: सारा रनिवास देखकर थकित रह गया ( निस्तब्ध हो गया ), तब सुमित्राजीने धीरज धरके कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं॥ ४ ॥

**दो०** 
> बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।  
> हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेस सहाय॥२८४॥

भावार्थ: और प्रेमसहित सद्भावसे बोलीं—अब आप शीघ्र डेरेको पधारिये। हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं॥ २८४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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