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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 283"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 283

**चौ०** 
> ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥  
> राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥१॥

भावार्थ: ईश्वरके अनुग्रह और आपके आशीर्वादसे मेरे [ चारों ] पुत्र और [ चारों ] बहुएँ गङ्गाजीके जलके समान पवित्र हैं। हे सखी! मैंने कभी श्रीरामकी सौगन्ध नहीं की, सो आज श्रीरामकी शपथ करके सत्य भावसे कहती हूँ— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥  
> कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥२॥

भावार्थ: भरतके शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपनका वर्णन करनेमें सरस्वतीजीकी बुद्धि भी हिचकती है। सीपसे कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं?॥ २ ॥

**चौ०** 
> जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा॥  
> कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ॥३॥

भावार्थ: मैं भरतको सदा कुलका दीपक जानती हूँ। महाराजने भी बार-बार मुझे यही कहा था। सोना कसौटीपर कसे जानेपर और रत्न पारखी ( जौहरी ) के मिलनेपर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुषकी परीक्षा समय पड़नेपर उसके स्वभावसे ही ( उसका चरित्र देखकर ) हो जाती है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा॥  
> सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी॥४॥

भावार्थ: किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेहमें सयानापन ( विवेक ) कम हो जाता है ( लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ )। कौसल्याजीकी गङ्गाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहके मारे विकल हो उठीं॥ ४ ॥

**दो०** 
> कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।  
> को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥२८३॥

भावार्थ: कौसल्याजीने फिर धीरज धरकर कहा—हे देवि मिथिलेश्वरी! सुनिये, ज्ञानके भण्डार श्रीजनकजीकी प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है?॥ २८३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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