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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 282"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 282

**चौ०** 
> सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥  
> जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बालकेलि सम बिधि मति भोरी॥१॥

भावार्थ: यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोकके साथ कहने लगीं—विधाताकी चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टिको उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है। विधाताकी बुद्धि बालकोंके खेलके समान भोली ( विवेकशून्य ) है॥ १ ॥

**चौ०** 
> कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥  
> कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥२॥

भावार्थ: कौसल्याजीने कहा—किसीका दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं। कर्मकी गति कठिन ( दुर्विज्ञेय ) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलोंका देनेवाला है॥ २ ॥

**चौ०** 
> ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥  
> देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥३॥

भावार्थ: ईश्वरकी आज्ञा सभीके सिरपर है। उत्पत्ति, स्थिति ( पालन ) और लय ( संहार ) तथा अमृत और विषके भी सिरपर है ( ये सब भी उसीके अधीन हैं )। हे देवि! मोहवश सोच करना व्यर्थ है। विधाताका प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी॥  
> सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी॥४॥

भावार्थ: महाराजके मरने और जीनेकी बातको हृदयमें याद करके जो चिन्ता करती हैं, वह तो हे सखी! हम अपने ही हितकी हानि देखकर ( स्वार्थवश ) करती हैं। सीताजीकी माताने कहा—आपका कथन उत्तम और सत्य है। आप पुण्यात्माओंके सीमारूप अवधपति ( महाराज दशरथजी ) की ही तो रानी हैं। [ फिर, भला ऐसा क्यों न कहेंगी ]॥ ४ ॥

**दो०** 
> लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।  
> गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥२८२॥

भावार्थ: कौसल्याजीने दुःखभरे हृदयसे कहा—श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनमें जायँ, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरतकी चिन्ता है॥ २८२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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