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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 280"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 280

**चौ०** 
> एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥  
> दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार चार दिन बीत गये। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजोंके मनमें ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजीके बिना लौटना अच्छा नहीं है॥ १ ॥

**चौ०** 
> सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥  
> परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥२॥

भावार्थ: श्रीसीतारामजीके साथ वनमें रहना करोड़ों देवलोकोंके [ निवासके ] समान सुखदायक है। श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजीको छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥  
> मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥३॥

भावार्थ: जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजीके पास वनमें निवास हो सकता है। मन्दाकिनीजीका तीनों समय स्नान और आनन्द तथा मङ्गलोंकी माला ( समूह ) रूप श्रीरामका दर्शन, ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥  
> सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीके पर्वत ( कामदनाथ ), वन और तपस्वियोंके स्थानोंमें घूमना और अमृतके समान कन्द, मूल, फलोंका भोजन। चौदह वर्ष सुखके साथ पलके समान हो जायँगे ( बीत जायँगे ), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे॥ ४ ॥

**दो०** 
> एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।  
> सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥२८०॥

भावार्थ: सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुखके योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ? दोनों समाजोंका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सहज स्वभावसे ही प्रेम है॥ २८० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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