---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 28"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-28"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 28

**चौ०** 
> जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥  
> थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥१॥

भावार्थ: राजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म ( मतलब ) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरोंको थाती ( धरोहर ) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसङ्ग याद नहीं रहा॥ १ ॥

**चौ०** 
> झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥  
> रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥२॥

भावार्थ: मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दोके बदले चार माँग लो। रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता॥ २ ॥

**चौ०** 
> नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥  
> सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥३॥

भावार्थ: असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है। क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं। ‘सत्य’ ही समस्त उत्तम सुकृतों ( पुण्यों ) की जड़ है। यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥  
> बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥४॥

भावार्थ: उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजीकी शपथ करनेमें आ गयी ( मुँहसे निकल पड़ी )। श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत ( पुण्य ) और स्नेहकी सीमा हैं। इस प्रकार बात पक्की कराके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत ( बुरे विचार ) रूपी दुष्ट पक्षी ( बाज ) [ को छोड़नेके लिये उस ] की कुलही ( आँखोंपरकी टोपी ) खोल दी॥ ४ ॥

**दो०** 
> भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।  
> भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥२८॥

भावार्थ: राजाका मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियोंका समुदाय है। उसपर भीलनीकी तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है॥ २८ ॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-27  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-29

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
