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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 278"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 278

**चौ०** 
> जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥  
> हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥१॥

भावार्थ: जो दशरथजीकी नगरी अयोध्याके रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजीके नगर जनकपुरके रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठजी तथा जनकजीके पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदयका मार्ग तथा परमार्थका मार्ग छान डाला था,॥ १ ॥

**चौ०** 
> लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका॥  
> कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं॥२॥

भावार्थ: वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे। विश्वामित्रजीने पुरानी कथाएँ ( इतिहास ) कह-कहकर सारी सभाको सुन्दर वाणीसे समझाया॥ २ ॥

**चौ०** 
> तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥  
> मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥३॥

भावार्थ: तब श्रीरघुनाथजीने विश्वामित्रजीसे कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही रह गये थे [ अब कुछ आहार करना चाहिये ]। विश्वामित्रजीने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं। ढाई पहर दिन [ आज भी ] बीत गया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥  
> कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना॥४॥

भावार्थ: विश्वामित्रजीका रुख देखकर तिरहुतराज जनकजीने कहा—यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है। राजाका सुन्दर कथन सबके मनको अच्छा लगा। सब आज्ञा पाकर नहाने चले॥ ४ ॥

**दो०** 
> तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।  
> लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार॥२७८॥

भावार्थ: उसी समय अनेकों प्रकारके बहुत-से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझोंमें भर-भरकर वनवासी ( कोल-किरात ) लोग ले आये॥ २७८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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