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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 277"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 277

**चौ०** 
> जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥  
> तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥१॥

भावार्थ: जिन राजा जनकका ज्ञानरूपी सूर्य भव ( आवागमन ) रूपी रात्रिका नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं ( आनन्दित करती हैं ), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं? यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है! [ अर्थात्‌ राजा जनककी यह दशा श्रीसीतारामजीके अलौकिक प्रेमके कारण हुई, लौकिक मोह-ममताके कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममताको पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजीका प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता ]॥ १ ॥

**चौ०** 
> बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥  
> राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥२॥

भावार्थ: विषयी, साधक और ज्ञानवान्‌ सिद्ध पुरुष—जगत्‌में ये तीन प्रकारके जीव वेदोंने बताये हैं। इन तीनोंमें जिसका चित्त श्रीरामजीके स्नेहसे सरस ( सराबोर ) रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका बड़ा आदर होता है॥ २ ॥

**चौ०** 
> सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥  
> मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए॥३॥

भावार्थ: श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज। वसिष्ठजीने विदेहराज ( जनकजी ) को बहुत प्रकारसे समझाया। तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥  
> पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥४॥

भावार्थ: स्त्री-पुरुष सब शोकसे पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जलके बीत गया ( भोजनकी बात तो दूर रही, किसीने जलतक नहीं पिया )। पशु, पक्षी और हिरनोंतकने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियोंका तो विचार ही क्या किया जाय?॥ ४ ॥

**दो०** 
> दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।  
> बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात॥२७७॥

भावार्थ: निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओरके समाजने दूसरे दिन सबेरे स्नान किया और सब बड़के वृक्षके नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं॥ २७७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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