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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 275"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 275

**चौ०** 
> भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥  
> गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं॥१॥

भावार्थ: भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे ( जनकजीकी अगवानीमें ) चले। जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया ( पैदल चलना शुरू कर दिया )॥ १ ॥

**चौ०** 
> राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू॥  
> मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही॥२॥

भावार्थ: श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं। बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो?॥ २ ॥

**चौ०** 
> आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती॥  
> आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे॥३॥

भावार्थ: जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेममें भर गये और आदरपूर्वक आपसमें मिलने लगे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन॥  
> भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि॥४॥

भावार्थ: जनकजी [ वसिष्ठ आदि अयोध्यावासी ] मुनियोंके चरणोंकी वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजीने [ शतानन्द आदि जनकपुरवासी ] ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसमेत श्रीरामजी राजा जनकजीसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रमको लिवा चले॥ ४ ॥

**दो०** 
> आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।  
> सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥२७५॥

भावार्थ: श्रीरामजीका आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जलसे परिपूर्ण समुद्र है। जनकजीकी सेना ( समाज ) मानो करुणा ( करुणरस ) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [ उस आश्रमरूपी शान्तरसके समुद्रमें मिलानेके लिये ] लिये जा रहे हैं॥ २७५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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