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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 274"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 274

**चौ०** 
> सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥  
> एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥१॥

भावार्थ: अयोध्यावासियोंकी प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्यकी निन्दा करते हैं। अवधवासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजीको पुलकितशरीर हो प्रणाम करते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥  
> सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं॥२॥

भावार्थ: ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियोंके स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार श्रीरामजीका दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानीके साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी सराहना करते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥  
> सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥३॥

भावार्थ: श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समुद्र हैं। वे सुन्दर मुखके [ या सबके अनुकूल रहनेवाले ], सुन्दर नेत्रवाले [ या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले ] और सरलस्वभाव हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे॥  
> हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते-कहते सब लोग प्रेममें भर गये और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे कि जगत्‌में हमारे समान पुण्यकी बड़ी पूँजीवाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं ( ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं )॥ ४ ॥

**दो०** 
> प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।  
> सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥२७४॥

भावार्थ: उस समय सब लोग प्रेममें मग्न हैं। इतनेमें ही मिथिलापति जनकजीको आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दीसे उठ खड़े हुए॥ २७४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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