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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 272"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 272

**चौ०** 
> दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥  
> सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥१॥

भावार्थ: [ गुप्त ] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥  
> घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥२॥

भावार्थ: फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया। घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर घोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी सवारियाँ सजवायीं॥ २ ॥

**चौ०** 
> दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥  
> भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥३॥

भावार्थ: वे दुघड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे,॥ ३ ॥

**चौ०** 
> खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥  
> साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥४॥

भावार्थ: तब हे नाथ! हमें खबर लेनेको भेजा। उन्होंने ( दूतोंने ) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कोई छः-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत विदा कर दिया॥ ४ ॥

**दो०** 
> सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।  
> रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु॥२७२॥

भावार्थ: जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजीको बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये॥ २७२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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