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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 27"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 27

**चौ०** 
> पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥  
> भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥१॥

भावार्थ: अपने जीमें कैकेयीको सुहृद् जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले—हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगरमें घर-घर आनन्दके बधावे बज रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥  
> दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥२॥

भावार्थ: मैं कल ही रामको युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मङ्गल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा ( फटने लगा )। मानो पका हुआ बालतोड़ ( फोड़ा ) छू गया हो॥ २ ॥

**चौ०** 
> ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥  
> लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥३॥

भावार्थ: ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोरकी स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती ( जिसमें उसका भेद न खुल जाय )। राजा उसकी कपट-चतुराईको नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थराकी पढ़ायी हुई है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥  
> कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥४॥

भावार्थ: यद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर ( ऊपरसे प्रेम दिखाकर ) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली— ॥ ४ ॥

**दो०** 
> मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।  
> देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥२७॥

भावार्थ: हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो वरदान देनेको कहा था, उनके भी मिलनेमें सन्देह है॥ २७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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