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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 269"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 269

**चौ०** 
> नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥  
> जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई॥१॥

भावार्थ: अथवा हम तीनों भाई वन चले जायँ और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजीसहित [ अयोध्याको ] लौट जाइये। हे दयासागर! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिये॥ १ ॥

**चौ०** 
> देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू। मोरें नीति न धरम बिचारू॥  
> कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू॥२॥

भावार्थ: हे देव! आपने सारा भार ( जिम्मेवारी ) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त ( दुखी ) मनुष्यके चित्तमें चेत ( विवेक ) नहीं रहता॥ २ ॥

**चौ०** 
> उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई॥  
> अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥३॥

भावार्थ: स्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [ कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ ]। किन्तु स्वामी ( आप ) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥  
> प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ॥४॥

भावार्थ: हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे। प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगत्‌के कल्याणके लिये एक यही उपाय है॥ ४ ॥

**दो०** 
> प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।  
> सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥२६९॥

भावार्थ: प्रसन्न मनसे संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा-चढ़ाकर [ पालन ] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी॥ २६९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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