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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 266"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 266

**चौ०** 
> सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई॥  
> भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई॥१॥

भावार्थ: सीतानाथ श्रीरामजीके सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान सुन्दर है। तुम्हारे मनमें भरतजीकी भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो। विधाताने बात बना दी॥ १ ॥

**चौ०** 
> देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥  
> मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं॥२॥

भावार्थ: हे देवराज! भरतजीका प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके पूर्णरूपसे वशमें हैं। हे देवताओ! भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीकी परछाईं ( परछाईंकी भाँति उनका अनुसरण करनेवाला ) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है॥ २ ॥

**चौ०** 
> सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥  
> निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥३॥

भावार्थ: देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति ( आपसका विचार ) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ। भरतजीने अपने मनमें सब बोझा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों ( अनेकों ) प्रकारके अनुमान ( विचार ) करने लगे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥  
> निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥४॥

भावार्थ: सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ञामें ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया ( अर्थात्‌ अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया )॥ ४ ॥

**दो०** 
> कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।  
> करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ॥२६६॥

भावार्थ: श्रीजानकीनाथजीने सब प्रकारसे मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों कर-कमलोंको जोड़कर प्रणाम करके बोले— ॥ २६६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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