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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 264"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 264

**चौ०** 
> कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥  
> तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥१॥

भावार्थ: हे भरत! मैं स्वभावसे ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है। हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते॥ १ ॥

**चौ०** 
> मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥  
> हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥२॥

भावार्थ: पक्षी और पशु मुनियोंके पास [ बेधड़क ] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकोंको देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है॥ २ ॥

**चौ०** 
> तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें॥  
> राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥३॥

भावार्थ: हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ! क्या करूँ? जीमें बड़ा असमञ्जस ( दुविधा ) है। राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़ दिया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥  
> ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥४॥

भावार्थ: उनके वचनको मेटते मनमें सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ॥ ४ ॥

**दो०** 
> मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।  
> सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु॥२६४॥

भावार्थ: तुम मनको प्रसन्न कर और संकोचको त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया॥ २६४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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