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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 260"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 260

**चौ०** 
> सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥  
> लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥१॥

भावार्थ: मुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर—गुरु तथा स्वामीको भरपेट अपने अनुकूल जानकर—सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे॥ १ ॥

**चौ०** 
> पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥  
> कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥२॥

भावार्थ: शरीरसे पुलकित होकर वे सभामें खड़े हो गये। कमलके समान नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंकी बाढ़ आ गयी। [ वे बोले— ] मेरा कहना तो मुनिनाथने ही निबाह दिया ( जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया )। इससे अधिक मैं क्या कहूँ ?॥ २ ॥

**चौ०** 
> मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥  
> मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥३॥

भावार्थ: अपने स्वामीका स्वभाव मैं जानता हूँ। वे अपराधीपर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेलमें भी कभी उनकी रिस ( अप्रसन्नता ) नहीं देखी॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥  
> मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥४॥

भावार्थ: बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मनको कभी नहीं तोड़ा ( मेरे मनके प्रतिकूल कोई काम नहीं किया )। मैंने प्रभुकी कृपाकी रीतिको हृदयमें भलीभाँति देखा ( अनुभव किया है )। मेरे हारनेपर भी खेलमें प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।  
> दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन॥२६०॥

भावार्थ: मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक प्रभुके दर्शनसे तृप्त नहीं हुए॥ २६० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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