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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 258"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 258

श्रीराम-भरतादिका संवाद

**चौ०** 
> आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥  
> सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥१॥

भावार्थ: आर्त ( दुःखी ) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है। मुनिके वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है॥ १ ॥

**चौ०** 
> सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें॥  
> प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौं सिख सोई॥२॥

भावार्थ: आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ॥ २ ॥

**चौ०** 
> पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥  
> कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥३॥

भावार्थ: फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरहसे सेवामें लग जायगा ( आज्ञापालन करेगा )। मुनि वसिष्ठजी कहने लगे—हे राम! तुमने सच कहा। पर भरतके प्रेमने विचारको नहीं रहने दिया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥  
> मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥४॥

भावार्थ: इसीलिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गयी है। मेरी समझमें तो भरतकी रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा॥ ४ ॥

**दो०** 
> भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।  
> करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥२५८॥

भावार्थ: पहले भरतकी विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदोंका निचोड़ ( सार ) निकालकर वैसा ही ( उसीके अनुसार ) कीजिये॥ २५८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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