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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 257"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 257

**चौ०** 
> भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥  
> भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥१॥

भावार्थ: भरतजीके वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये ( किसीको अपने देहकी सुधि न रही )। भरतजीकी महान्‌ महिमा समुद्र है, मुनिकी बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्रीके समान खड़ी है॥ १ ॥

**चौ०** 
> गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥  
> औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥२॥

भावार्थ: वह [ उस समुद्रके ] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदयमें उपाय भी ढूँढ़े! पर [ उसे पार करनेका साधन ] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजीकी बड़ाई और कौन करेगा ? तलैयाकी सीपीमें भी कहीं समुद्र समा सकता है ?॥ २ ॥

**चौ०** 
> भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥  
> प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥३॥

भावार्थ: मुनि वसिष्ठजीके अन्तरात्माको भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजीके पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने प्रणामकर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनिकी आज्ञा सुनकर बैठ गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥  
> सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥४॥

भावार्थ: श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसरके अनुसार विचार करके वचन बोले—हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञानके भण्डार राम! सुनिये— ॥ ४ ॥

**दो०** 
> सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।  
> पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥२५७॥

भावार्थ: आप सबके हृदयके भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भावको जानते हैं। जिसमें पुरवासियोंका, माताओंका और भरतका हित हो, वही उपाय बतलाइये॥ २५७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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