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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 254"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 254

**चौ०** 
> बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥  
> धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥१॥

भावार्थ: श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले—हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुलके सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान्‌ हैं॥१॥

**चौ०** 
> सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू॥  
> गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥२॥

भावार्थ: वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं। श्रीरामजीका अवतार ही जगत्‌के कल्याणके लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं॥२॥

**चौ०** 
> नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥  
> बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥३॥

भावार्थ: नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको श्रीरामजीके समान यथार्थ ( तत्त्वसे ) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥  
> करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥४॥

भावार्थ: शेषजी और [ पृथ्वी एवं पातालके अन्यान्य ] राजा आदि जहाँतक प्रभुता है, और योगकी सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रोंमें गायी गयी हैं, हृदयमें अच्छी तरह विचार कर देखो, [ तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि ] श्रीरामजीकी आज्ञा इन सभीके सिरपर है ( अर्थात्‌ श्रीरामजी ही सबके एकमात्र महान्‌ महेश्वर हैं )॥ ४ ॥

**दो०** 
> राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।  
> समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥२५४॥

भावार्थ: अतएव श्रीरामजीकी आज्ञा और रुख रखनेमें ही हम सबका हित होगा। [ इस तत्त्व और रहस्यको समझकर ] अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो॥ २५४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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