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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 251"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 251

**चौ०** 
> तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥  
> देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईंधनु पात किरात मिताई॥१॥

भावार्थ: आप प्रिय पाहुने वनमें पधारे हैं। आपकी सेवा करनेके योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे ? भीलोंकी मित्रता तो बस, ईंधन ( लकड़ी ) और पत्तोंहीतक है॥१॥

**चौ०** 
> यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई॥  
> हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती॥२॥

भावार्थ: हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते। हमलोग जड़ जीव हैं, जीवोंकी हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं॥२॥

**चौ०** 
> पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥  
> सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥३॥

भावार्थ: हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमरमें कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं। हममें स्वप्नमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसी ? यह सब तो श्रीरघुनाथजीके दर्शनका प्रभाव है॥३॥

**चौ०** 
> जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥  
> बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे॥४॥

भावार्थ: जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियोंके वचन सुनकर अयोध्याके लोग प्रेममें भर गये और उनके भाग्यकी सराहना करने लगे॥४॥

**छं०** 
> लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।  
> बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥  
> नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।  
> तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥

भावार्थ: सब उनके भाग्यकी सराहना करने लगे और प्रेमके वचन सुनाने लगे। उन लोगोंके बोलने और मिलनेका ढंग तथा श्रीसीतारामजीके चरणोंमें उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भीलोंकी वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेमका निरादर करते हैं ( उसे धिक्कार देते हैं )। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा है कि लोहा नौकाको अपने ऊपर लेकर तैर गया।

**सो०** 
> बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।  
> जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम॥२५१॥

भावार्थ: सब लोग दिनोंदिन परम आनन्दित होते हुए वनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वर्षाके जलसे मेढक और मोर मोटे हो जाते हैं ( प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं )॥२५१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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