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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 250"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 250

**चौ०** 
> कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥  
> भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥१॥

भावार्थ: कोल, किरात और भील आदि वनके रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृतके समान स्वादिष्ट मधु ( शहद ) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कन्द, मूल, फल और अंकुर आदिकी जूड़ियों ( अँटियों ) को॥१॥

**चौ०** 
> सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥  
> देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं॥२॥

भावार्थ: सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजोंके अलग-अलग स्वाद, भेद ( प्रकार ), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देनेमें श्रीरामजीकी दुहाई देते हैं॥२॥

**चौ०** 
> कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी॥  
> तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा॥३॥

भावार्थ: प्रेममें मग्न हुए वे कोमल वाणीसे कहते हैं कि साधु लोग प्रेमको पहचानकर उसका सम्मान करते हैं ( अर्थात्‌ आप साधु हैं, आप हमारे प्रेमको देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेमका तिरस्कार न कीजिये )। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजीकी कृपासे ही हमने आपलोगोंके दर्शन पाये हैं॥३॥

**चौ०** 
> हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥  
> राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥४॥

भावार्थ: हमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गङ्गाजीकी धारा दुर्लभ है! [ देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये॥४॥

**दो०** 
> यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।  
> हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु॥२५०॥

भावार्थ: हृदयमें ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करनेके लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये॥२५०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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