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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 25"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 25

दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना

**चौ०** 
> कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥  
> सुरपति बसइ बाहँबल जाकें। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥१॥

भावार्थ: कोपभवनका नाम सुनकर राजा सहम गये। डरके मारे उनका पाँव आगेको नहीं पड़ता। स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओंके बलपर [ राक्षसोंसे निर्भय होकर ] बसता है और सम्पूर्ण राजालोग जिनका रुख देखते रहते हैं,॥ १ ॥

**चौ०** 
> सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥  
> सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥२॥

भावार्थ: वही राजा दशरथ स्त्रीका क्रोध सुनकर सूख गये। कामदेवका प्रताप और महिमा तो देखिये। जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदिकी चोट अपने अङ्गोंपर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेवके पुष्पबाणसे मारे गये॥ २ ॥

**चौ०** 
> सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥  
> भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना॥३॥

भावार्थ: राजा डरते-डरते अपनी प्यारी कैकेयीके पास गये। उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। कैकेयी जमीनपर पड़ी है। पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है। शरीरके नाना आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अनअहिवातु सूच जनु भाबी॥  
> जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥४॥

भावार्थ: उस दुर्बुद्धि कैकेयीको यह कुवेषता ( बुरा वेष ) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापनकी सूचना दे रही हो। राजा उसके पास जाकर कोमल वाणीसे बोले—हे प्राणप्रिये! किसलिये रिसाई ( रूठी ) हो ?॥ ४॥

**छं०** 
> केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।  
> मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥  
> दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।  
> तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

भावार्थ: ‘हे रानी! किसलिये रूठी हो ?’ यह कहकर राजा उसे हाथसे स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथको [ झटककर ] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोधमें भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टिसे देख रही हो। दोनों [ वरदानोंकी ] वासनाएँ उस नागिनकी दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटनेके लिये मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहारके वशमें होकर इसे ( इस प्रकार हाथ झटकने और नागिनकी भाँति देखनेको ) कामदेवकी क्रीड़ा ही समझ रहे हैं।

**सो०** 
> बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि।  
> कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥२५॥

भावार्थ: राजा बार-बार कह रहे हैं—हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोधका कारण तो सुना॥ २५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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