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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 244"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 244

**चौ०** 
> आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना॥  
> जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥१॥

भावार्थ: दयाकी खान, सुजान भगवान्‌ श्रीरामजीने सब लोगोंको दुखी ( मिलनेके लिये व्याकुल ) जाना। तब जो जिस भावसे मिलनेका अभिलाषी था, उस-उसका उस-उस प्रकारका रुख रखते हुए ( उसकी रुचिके अनुसार )॥ १ ॥

**चौ०** 
> सानुज मिलि पल महुँ सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥  
> यह बड़ि बात राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं॥२॥

भावार्थ: उन्होंने लक्ष्मणजीसहित पलभरमें सब किसीसे मिलकर उनके दुःख और कठिन संतापको दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक ही सूर्यकी [ पृथक्‌-पृथक्‌ ] छाया ( प्रतिबिम्ब ) एक साथ ही दीखती है॥ २ ॥

**चौ०** 
> मिलि केवटहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा॥  
> देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं॥३॥

भावार्थ: समस्त पुरवासी प्रेममें उमँगकर केवटसे मिलकर [ उसके ] भाग्यकी सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीने सब माताओंको दुःखी देखा। मानो सुन्दर लताओंकी पंक्तियोंको पाला मार गया हो॥ ३ ॥

**चौ०** 
> प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई॥  
> पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी॥४॥

भावार्थ: सबसे पहले रामजी कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्तिसे उसकी बुद्धिको तर कर दिया। फिर चरणोंमें गिरकर काल, कर्म और विधाताके सिर दोष मँढ़कर, श्रीरामजीने उनको सान्त्वना दी॥ ४॥

**दो०** 
> भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।  
> अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु॥२४४॥

भावार्थ: फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओंसे मिले। उन्होंने सबको समझा-बुझाकर सन्तोष कराया कि हे माता! जगत् ईश्वरके अधीन है, किसीको भी दोष नहीं देना चाहिये॥ २४४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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