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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 242"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 242

**चौ०** 
> भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥  
> पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥१॥

भावार्थ: तब लक्ष्मणजी ललककर ( बड़ी उमंगके साथ ) छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले। फिर उन्होंने निषादराजको हृदयसे लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयोंने [ उपस्थित ] मुनियोंको प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए॥ १ ॥

**चौ०** 
> सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥  
> पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥२॥

भावार्थ: छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजी प्रेममें उमँगकर सीताजीके चरणकमलोंकी रज सिरपर धारणकर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताजीने उन्हें उठाकर उनके सिरको अपने करकमलसे स्पर्शकर ( सिरपर हाथ फेरकर ) उन दोनोंको बैठाया॥ २ ॥

**चौ०** 
> सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥  
> सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥३॥

भावार्थ: सीताजीने मन-ही-मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेहमें मग्न हैं, उन्हें देहकी सुध-बुध नहीं है। सीताजीको सब प्रकारसे अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये और उनके हृदयका कल्पित भय जाता रहा॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥  
> तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥४॥

भावार्थ: उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेमसे परिपूर्ण है, वह अपनी गतिसे खाली है ( अर्थात्‌ संकल्प-विकल्प और चाञ्चल्यसे शून्य है )। उस अवसरपर केवट ( निषादराज ) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा—॥ ४ ॥

**दो०** 
> नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।  
> सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥२४२॥

भावार्थ: हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजीके साथ सब माताएँ, नगरनिवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री—सब आपके वियोगसे व्याकुल होकर आये हैं॥ २४२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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