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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 240"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 240

**चौ०** 
> सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥  
> पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥१॥

भावार्थ: छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराजसमेत भरतजीका मन [ प्रेममें ] मग्न हो रहा है। हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। ‘हे नाथ! रक्षा कीजिये, हे गुसाईं ! रक्षा कीजिये’ ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर दण्डकी तरह गिर पड़े॥ १ ॥

**चौ०** 
> बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने॥  
> बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा॥२॥

भावार्थ: प्रेमभरे वचनोंसे लक्ष्मणजीने पहचान लिया और मनमें जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। [ वे श्रीरामजीकी ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं। ] अब इस ओर तो भाई भरतजीका सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजीकी सेवाकी प्रबल परवशता॥ २ ॥

**चौ०** 
> मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई॥  
> रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥३॥

भावार्थ: न तो [ क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथक्‌ होकर ] मिलते ही बनता है और न [ प्रेमवश ] छोड़ते ( उपेक्षा करते ) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति ( दुविधा ) का वर्णन कर सकता है। वे सेवापर भार रखकर रह गये ( सेवाको ही विशेष महत्त्वपूर्ण समझकर उसीमें लगे रहे ) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी ( पतंग उड़ानेवाला ) खींच रहा हो॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥  
> उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥४॥

भावार्थ: लक्ष्मणजीने प्रेमसहित पृथ्वीपर मस्तक नवाकर कहा—हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेममें अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण॥ ४ ॥

**दो०** 
> बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।  
> भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥२४०॥

भावार्थ: कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजीके मिलनेकी रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी॥ २४० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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