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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 239"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-239"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 239

**चौ०** 
> सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा॥  
> भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन॥१॥

भावार्थ: सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको सघन वनकी आड़के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समस्त सुमङ्गलोंके धाम और सुन्दर पवित्र आश्रमको देखा॥ १ ॥

**चौ०** 
> करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा॥  
> देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे॥२॥

भावार्थ: आश्रममें प्रवेश करते ही भरतजीका दुःख और दाह ( जलन ) मिट गया, मानो योगीको परमार्थ ( परमतत्त्व ) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजीने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभुके आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं ( पूछी हुई बातका प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं )॥ २ ॥

**चौ०** 
> सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें॥  
> बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥ ३ ॥

भावार्थ: सिरपर जटा है। कमरमें मुनियोंका ( वल्कल ) वस्त्र बाँधे हैं और उसीमें तरकस कसे हैं। हाथमें बाण तथा कंधेपर धनुष है। वेदीपर मुनि तथा साधुओंका समुदाय बैठा है और सीताजीसहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा॥  
> कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीके वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [ सीतारामजी ऐसे लगते हैं ] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं ( अर्थात्‌ जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है। )॥ ४ ॥

**दो०** 
> लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।  
> ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु॥२३९॥

भावार्थ: सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात्‌ भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं॥ २३९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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