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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 238"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 238

**चौ०** 
> सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥  
> करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥१॥

भावार्थ: सखाके वचन सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतजीके नेत्रोंमें जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेमका वर्णन करनेमें सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं॥१॥

**चौ०** 
> हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥  
> रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो। वहाँकी रजको मस्तकपर रखकर हृदयमें और नेत्रोंमें लगाते हैं और श्रीरघुनाथजीके मिलनेके समान सुख पाते हैं॥२॥

**चौ०** 
> देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥  
> सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥३॥

भावार्थ: भरतजीकी अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वनके पशु, पक्षी और जड़ ( वृक्षादि ) जीव प्रेममें मग्न हो गये। प्रेमके विशेष वश होनेसे सखा निषादराजको भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे॥३॥

**चौ०** 
> निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे॥  
> होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को॥४॥

भावार्थ: भरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [ अथवा प्रेम ] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता?॥४॥

**दो०** 
> पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।  
> मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥२३८॥

भावार्थ: प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने देवता और साधुओंके हितके लिये स्वयं [ इस भरतरूपी गहरे समुद्रको अपने विरहरूपी मन्दराचलसे ] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है॥ २३८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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