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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 236"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 236

**चौ०** 
> बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥  
> बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥१॥

भावार्थ: वनरूपी प्रान्तोंमें जो मुनियोंके बहुत-से निवासस्थान हैं वही मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ोंका समूह है। बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओंका समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥१॥

**चौ०** 
> खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा॥  
> बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥२॥

भावार्थ: गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैलोंको देखकर राजाके साजको सराहते ही बनता है। ये सब आपसका वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरङ्गिणी सेना है॥२॥

**चौ०** 
> झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥  
> चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन॥३॥

भावार्थ: पानीके झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ अनेकों प्रकारके नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलोंके समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं॥३॥

**चौ०** 
> अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥  
> बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला॥४॥

भावार्थ: भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्यमें चारों ओर मङ्गल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलोंसे युक्त हैं। सारा समाज आनन्द और मङ्गलका मूल बन रहा है॥४॥

**दो०** 
> राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।  
> तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु॥२३६॥

भावार्थ: श्रीरामजीके पर्वतकी शोभा देखकर भरतजीके हृदयमें अत्यन्त प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियमकी समाप्ति होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है॥२३६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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