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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 234"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 234

**चौ०** 
> जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥  
> मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥१॥

भावार्थ: चाहे मलिन-मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें ( कुछ भी करें ); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जूतियाँ ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है॥१॥

**चौ०** 
> जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥  
> अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥२॥

भावार्थ: जगत्‌में यशके पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेमको सदा नया बनाये रखनेमें निपुण हैं। ऐसा मनमें सोचते हुए भरतजी मार्गमें चले जाते हैं। उनके सब अङ्ग संकोच और प्रेमसे शिथिल हो रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥  
> जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥३॥

भावार्थ: माताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते ( स्मरण करते ) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं॥३॥

**चौ०** 
> भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥  
> देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू॥४॥

भावार्थ: उस समय भरतकी दशा कैसी है? जैसी जलके प्रवाहमें जलके भौंरेकी गति होती है। भरतजीका सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया ( देहकी सुध-बुध भूल गया )॥४॥

**दो०** 
> लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।  
> मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु॥२३४॥

भावार्थ: मङ्गल-शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा—सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्तमें दुःख होगा॥२३४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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