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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 230"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 230

**चौ०** 
> उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥  
> बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥१॥

भावार्थ: यों कहकर लक्ष्मणजीने उठकर, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी। मानो वीररस सोतेसे जाग उठा हो। सिरपर जटा बाँधकर कमरमें तरकस कस लिया और धनुषको सजकर तथा बाणको हाथमें लेकर कहा—॥१॥

**चौ०** 
> आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ॥  
> राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई॥२॥

भावार्थ: आज मैं श्रीराम (आप) का सेवक होनेका यश लूँ और भरतको संग्राममें शिक्षा दूँ। श्रीरामचन्द्रजी (आप) के निरादरका फल पाकर दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) रणशय्यापर सोवें!॥२॥

**चौ०** 
> आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥  
> जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥३॥

भावार्थ: अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया। आज मैं पिछला सब क्रोध प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको कुचल डालता है और बाज जैसे लवेको लपेटमें ले लेता है॥३॥

**चौ०** 
> तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥  
> जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई॥४॥

भावार्थ: वैसे ही भरतको सेनासमेत और छोटे भाईसहित तिरस्कार करके मैदानमें पछाड़ूँगा। यदि शङ्करजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजीकी सौगन्ध है, मैं उन्हें युद्धमें [अवश्य] मार डालूँगा (छोड़ूँगा नहीं)॥४॥

**दो०** 
> अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।  
> सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥२३०॥

भावार्थ: लक्ष्मणजीको अत्यन्त क्रोधसे तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक ( सत्य ) सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल घबड़ाकर भागना चाहते हैं॥२३०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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