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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 228"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 228

**चौ०** 
> बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥  
> भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना॥१॥

भावार्थ: परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत्‌ जानता है॥१॥

**चौ०** 
> तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई॥  
> कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी। जानि राम बनबास एकाकी॥२॥

भावार्थ: वे भरत भी आज श्रीरामजी (आप) का पद (सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्मकी मर्यादाको मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी (आप) वनवासमें अकेले (असहाय) हैं,॥२॥

**चौ०** 
> करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू॥  
> कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई॥३॥

भावार्थ: अपने मनमें बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्यको निष्कण्टक करनेके लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों (अनेकों) प्रकारकी कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं॥३॥

**चौ०** 
> जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली॥  
> भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ॥४॥

भावार्थ: यदि इनके हृदयमें कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियोंकी कतार [ऐसे समय] किसे सुहाती? परन्तु भरतको ही व्यर्थ कौन दोष दे? राजपद पा जानेपर सारा जगत्‌ ही पागल (मतवाला) हो जाता है॥४॥

**दो०** 
> ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।  
> लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥२२८॥

भावार्थ: चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा। और राजा वेनके समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनोंसे विमुख हो गया॥२२८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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