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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 226"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 226

**चौ०** 
> सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥  
> जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥१॥

भावार्थ: सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके मारे शिथिल होनेके कारण सूर्यास्त होनेतक ( दिनभरमें ) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थलका सुपास देखकर रातको वहीं [ बिना खाये-पीये ही ] रह गये। रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजीके प्रेमी भरतजीने आगे गमन किया॥ १ ॥

**चौ०** 
> उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा॥  
> सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥२॥

भावार्थ: उधर श्रीरामचन्द्रजी रात शेष रहते ही जागे। रातको सीताजीने ऐसा स्वप्न देखा [ जिसे वे श्रीरामजीको सुनाने लगीं ] मानो समाजसहित भरतजी यहाँ आये हैं। प्रभुके वियोगकी अग्निसे उनका शरीर संतप्त है॥ २॥

**चौ०** 
> सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी॥  
> सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन॥३॥

भावार्थ: सभी लोग मनमें उदास, दीन और दुःखी हैं। सासुओंको दूसरी ही सूरतमें देखा। सीताजीका स्वप्न सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्रोंमें जल भर आया और सबको सोचसे छुड़ा देनेवाले प्रभु स्वयं [ लीलासे ] सोचके वश हो गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई॥  
> अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने॥४॥

भावार्थ: [ और बोले— ] लक्ष्मण! यह स्वप्न अच्छा नहीं है। कोई भीषण कुसमाचार ( बहुत ही बुरी खबर ) सुनावेगा। ऐसा कहकर उन्होंने भाईसहित स्नान किया और त्रिपुरारि महादेवजीका पूजन करके साधुओंका सम्मान किया॥ ४॥

**छं०** 
> सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए।  
> नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥  
> तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।  
> सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥

भावार्थ: देवताओंका सम्मान ( पूजन ) और मुनियोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशाकी ओर देखने लगे। आकाशमें धूल छा रही है; बहुत-से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए प्रभुके आश्रमको आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे कि क्या कारण है? वे चित्तमें आश्चर्ययुक्त हो गये। उसी समय कोल-भीलोंने आकर सब समाचार कहे।

**सो०** 
> सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।  
> सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥२२६॥

भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मङ्गल वचन सुनते ही श्रीरामजीके मनमें बड़ा आनन्द हुआ। शरीरमें पुलकावली छा गयी, और शरद्-ऋतुके कमलके समान नेत्र प्रेमाश्रुओंसे भर गये॥२२६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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