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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 224"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 224

**चौ०** 
> निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा॥  
> तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा॥१॥

भावार्थ: [इस प्रकार] अपने गुणोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथा सुनते और श्रीरघुनाथजीको स्मरण करते हुए भरतजी चले जा रहे हैं। वे तीर्थ देखकर स्नान और मुनियोंके आश्रम तथा देवताओंके मन्दिर देखकर प्रणाम करते हैं,॥१॥

**चौ०** 
> मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू॥  
> मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी॥२॥

भावार्थ: और मन-ही-मन यह वरदान माँगते हैं कि श्रीसीतारामजीके चरणकमलोंमें प्रेम हो। मार्गमें भील, कोल आदि वनवासी तथा वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त मिलते हैं॥२॥

**चौ०** 
> करि प्रनामु पूँछहिं जेहि तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही॥  
> ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं॥३॥

भावार्थ: उनमेंसे जिस-तिससे प्रणाम करके पूछते हैं कि लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और जानकीजी किस वनमें हैं? वे प्रभुके सब समाचार कहते हैं और भरतजीको देखकर जन्मका फल पाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥  
> एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी॥४॥

भावार्थ: जो लोग कहते हैं कि हमने उनको कुशलपूर्वक देखा है, उनको ये श्रीराम-लक्ष्मणके समान ही प्यारे मानते हैं। इस प्रकार सबसे सुन्दर वाणीसे पूछते और श्रीरामजीके वनवासकी कहानी सुनते जाते हैं॥४॥

**दो०** 
> तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।  
> राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ॥२२४॥

भावार्थ: उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रातःकाल ही श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके चले। साथके सब लोगोंको भी भरतजीके समान ही श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा [लगी हुई] है॥२२४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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