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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 221"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 221

भरतजी चित्रकूटके मार्गमें

**चौ०** 
> जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥  
> रातिहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी॥१॥

भावार्थ: उस दिन यमुनाजीके किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिये [ खान-पान आदिकी ] सुन्दर व्यवस्था हुई। [ निषादराजका सङ्केत पाकर ] रात-ही-रातमें घाट-घाटकी अगणित नावें वहाँ आ गयीं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १ ॥

**चौ०** 
> प्रात पार भए एकहि खेवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ॥  
> चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई॥२॥

भावार्थ: सबेरे एक ही खेवेमें सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजकी इस सेवासे सन्तुष्ट हुए। फिर स्नान करके और नदीको सिर नवाकर निषादराजके साथ दोनों भाई चले॥ २॥

**चौ०** 
> आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें॥  
> तेहि पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें॥३॥

भावार्थ: आगे अच्छी-अच्छी सवारियोंपर श्रेष्ठ मुनि हैं, उनके पीछे सारा राजसमाज जा रहा है। उसके पीछे दोनों भाई बहुत सादे भूषण-वस्त्र और वेषसे पैदल चल रहे हैं॥ ३॥

**चौ०** 
> सेवक सुहृद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥  
> जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥४॥

भावार्थ: सेवक, मित्र और मन्त्रीके पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ श्रीरामजीने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं॥ ४॥

**दो०** 
> मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।  
> देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ॥२२१॥

भावार्थ: मार्गमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर घर और काम-काज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और उनके रूप ( सौन्दर्य ) और प्रेमको देखकर वे सब जन्म लेनेका फल पाकर आनन्दित होते हैं॥ २२१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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