---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 219"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-219"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 219

**चौ०** 
> सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥  
> मानत सुखु सेवक सेवकाईं। सेवक बैर बैरु अधिकाईं॥१॥

भावार्थ: हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो। श्रीरामजीको अपना सेवक परम प्रिय है। वे अपने सेवककी सेवासे सुख मानते हैं और सेवकके साथ वैर करनेसे बड़ा भारी वैर मानते हैं॥१॥

**चौ०** 
> जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥  
> करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥२॥

भावार्थ: यद्यपि वे सम हैं—उनमें न राग है, न रोष है। और न वे किसीका पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्वमें कर्मको ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है॥२॥

**चौ०** 
> तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥  
> अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस॥३॥

भावार्थ: तथापि वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं ( भक्तको प्रेमसे गले लगा लेते हैं और अभक्तको मारकर तार देते हैं )। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान्‌ श्रीराम भक्तके प्रेमवश ही सगुण हुए हैं॥३॥

**चौ०** 
> राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी॥  
> अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजी सदा अपने सेवकों ( भक्तों ) की रुचि रखते आये हैं। वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। ऐसा हृदयमें जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजीके चरणोंमें सुन्दर प्रीति करो॥४॥

**दो०** 
> राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।  
> भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल॥२१९॥

भावार्थ: हे देवराज इन्द्र! श्रीरामचन्द्रजीके भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, वे दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दयालु होते हैं। फिर, भरतजी तो भक्तोंके शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो॥२१९॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-218  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-220

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
