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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 217"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 217

इन्द्र-बृहस्पति-संवाद

**चौ०** 
> जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥  
> ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू॥१॥

भावार्थ: रास्तेमें असंख्य जड़-चेतन जीव थे। उनमेंसे जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखा वे सब [ उसी समय ] परमपदके अधिकारी हो गये। परन्तु अब भरतजीके दर्शनने तो उनका भव ( जन्म-मरण )-रूपी रोग मिटा ही दिया। [ श्रीरामदर्शनसे तो वे परमपदके अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरतदर्शनसे उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया ]॥१॥

**चौ०** 
> यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं॥  
> बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ॥२॥

भावार्थ: भरतजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मनमें स्मरण करते रहते हैं। जगत्‌में जो भी मनुष्य एक बार ‘राम’ कह लेते हैं, वे भी तरने-तारनेवाले हो जाते हैं!॥२॥

**चौ०** 
> भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता॥  
> सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं॥३॥

भावार्थ: फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे। तब भला उनके लिये मार्ग मङ्गल ( सुख ) दायक कैसे न हो ? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजीको देखकर हृदयमें हर्ष-लाभ करते हैं॥३॥

**चौ०** 
> देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥  
> गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेट न होई॥४॥

भावार्थ: भरतजीके [ इस प्रेमके ] प्रभावको देखकर देवराज इन्द्रको सोच हो गया [ कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय ]। संसार भलेके लिये भला और बुरेके लिये बुरा है ( मनुष्य जैसा आप होता है जगत्‌ उसे वैसा ही दीखता है )। उसने गुरु बृहस्पतिजीसे कहा—हे प्रभो! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीकी भेंट ही न हो॥४॥

**दो०** 
> रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।  
> बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥२१७॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी संकोची और प्रेमके वश हैं और भरतजी प्रेमके समुद्र हैं। बनी-बनायी बात बिगड़ना चाहती है, इसलिये कुछ छल ढूँढ़कर इसका उपाय कीजिये॥२१७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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