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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 216"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 216

**चौ०** 
> कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥  
> रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥१॥

भावार्थ: [ प्रातःकाल ] भरतजीने तीर्थराजमें स्नान किया और समाजसहित मुनिको सिर नवाकर और ऋषिकी आज्ञा तथा आशीर्वादको सिर चढ़ाकर दण्डवत्‌ करके बहुत विनती की॥१॥

**चौ०** 
> पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें॥  
> रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू॥२॥

भावार्थ: तदनन्तर रास्तेकी पहचान रखनेवाले लोगों ( कुशल पथप्रदर्शकों ) के साथ सब लोगोंको लिये हुए भरतजी चित्रकूटमें चित्त लगाये चले। भरतजी रामसखा गुहके हाथमें हाथ दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात्‌ प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो॥२॥

**चौ०** 
> नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया॥  
> लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी॥३॥

भावार्थ: न तो उनके पैरोंमें जूते हैं और न सिरपर छाया है। उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म निष्कपट ( सच्चा ) है। वे सखा निषादराजसे लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीसे कहता है॥३॥

**चौ०** 
> राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकें॥  
> देखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके ठहरनेकी जगहों और वृक्षोंको देखकर उनके हृदयमें प्रेम रोके नहीं रुकता। भरतजीकी यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी कोमल हो गयी और मार्ग मङ्गलका मूल बन गया॥४॥

**दो०** 
> किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।  
> तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥२१६॥

भावार्थ: बादल छाया किये जा रहे हैं, सुख देनेवाली सुन्दर हवा बह रही है। भरतजीके जाते समय मार्ग जैसा सुखदायक हुआ, वैसा श्रीरामचन्द्रजीको भी नहीं हुआ था॥२१६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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