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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 214"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 214

**चौ०** 
> रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी॥  
> कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई॥१॥

भावार्थ: ऋद्धि-सिद्धिने मुनिराजकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर अपनेको बड़भागिनी समझा। सब सिद्धियाँ आपसमें कहने लगीं—श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं, जिनकी तुलनामें कोई नहीं आ सकता॥ १ ॥

**चौ०** 
> मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू॥  
> अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना॥२॥

भावार्थ: अतः मुनिके चरणोंकी वन्दना करके आज वही करना चाहिये जिससे सारा राज-समाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने बहुत-से सुन्दर घर बनाये, जिन्हें देखकर विमान भी विलखते हैं ( लजा जाते हैं )॥ २ ॥

**चौ०** 
> भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे॥  
> दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें॥३॥

भावार्थ: उन घरोंमें बहुत-से भोग ( इन्द्रियोंके विषय ) और ऐश्वर्य ( ठाट-बाट ) का सामान भरकर रख दिया, जिन्हें देखकर देवता भी ललचा गये। दासी-दास सब प्रकारकी सामग्री लिये हुए मन लगाकर उनके मनोंको देखते रहते हैं ( अर्थात्‌ उनके मनकी रुचिके अनुसार करते रहते हैं )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं॥  
> प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही॥४॥

भावार्थ: जो सुखके सामान स्वर्गमें भी स्वप्नमें भी नहीं हैं ऐसे सब सामान सिद्धियोंने पलभरमें सज दिये। पहले तो उन्होंने सब किसीको, जिसकी जैसी रुचि थी वैसे ही, सुन्दर सुखदायक निवासस्थान दिये॥ ४ ॥

**दो०** 
> बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।  
> बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह॥२१४॥

भावार्थ: और फिर कुटुम्बसहित भरतजीको दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजीने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [ भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियोंको आराम मिले, इसलिये उनके मनकी बात जानकर मुनिने पहले उन लोगोंको स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजीको स्थान देनेके लिये आज्ञा दी थी। ] मुनिश्रेष्ठने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया॥ २१४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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