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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 212"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 212

**चौ०** 
> एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती॥  
> एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं॥१॥

भावार्थ: इसी दुःखकी जलनसे निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिनमें भूख लगती है, न रातको नींद आती है। मैंने मन-ही-मन समस्त विश्वको खोज डाला, पर इस कुरोगकी औषध कहीं नहीं है॥ १ ॥

**चौ०** 
> मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥  
> कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥२॥

भावार्थ: माताका कुमत ( बुरा विचार ) पापोंका मूल बढ़ई है। उसने हमारे हितका बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठका कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षकी अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्रको गाड़ दिया। [ यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है ]॥ २ ॥

**चौ०** 
> मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा॥  
> मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ॥३॥

भावार्थ: मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट ( बुरा साज ) रचा और सारे जगत्‌को बारहबाट ( छिन्न-भिन्न ) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई॥  
> तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटिहि राम पग देखी॥४॥

भावार्थ: भरतजीके वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सभीने उनकी बहुत प्रकारसे बड़ाई की। [ मुनिने कहा— ] हे तात! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा॥ ४ ॥

**दो०** 
> करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।  
> कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥२१२॥

भावार्थ: इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीने उनका समाधान करके कहा—अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये॥ २१२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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