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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 21"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 21

**चौ०** 
> नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥  
> अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥१॥

भावार्थ: मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है॥ १ ॥

**चौ०** 
> दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी॥  
> अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना॥२॥

भावार्थ: रानीने बहुत प्रकारके दीन वचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरीने त्रियाचरित्र फैलाया। [ वह बोली— ] तुम मनमें ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥  
> जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि॥३॥

भावार्थ: जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाममें यह ( बुराईरूप ) फल पायेगी। हे स्वामिनि! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिनमें कुछ भूख लगती है और न रातमें नींद ही आती है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥  
> भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ॥४॥

भावार्थ: मैंने ज्योतिषियोंसे पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर ( गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक ) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ। राजा तुम्हारी सेवाके वशमें हैं ही॥ ४॥

**दो०** 
> परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।  
> कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि॥२१॥

भावार्थ: [ कैकेयीने कहा— ]मैं तेरे कहनेसे कुएँमें गिर सकती हूँ, पुत्र और पतिको भी छोड़ सकती हूँ। जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हितके लिये उसे क्यों न करूँगी ?॥ २१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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