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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 209"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 209

**चौ०** 
> नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥  
> उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥१॥

भावार्थ: हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [ वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दुःख होता है ]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्रूपी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा॥ १ ॥

**चौ०** 
> कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥  
> निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥२॥

भावार्थ: त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमापर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका प्रतापरूपी सूर्य इसकी छविको हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसीको सुख देनेवाला होगा। कैकेयीका कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा॥  
> रामभगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ॥३॥

भावार्थ: यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतसे पूर्ण है। यह गुरुके अपमानरूपी दोषसे दूषित नहीं है। तुमने इस यशरूपी चन्द्रमाकी सृष्टि करके पृथ्वीपर भी अमृतको सुलभ कर दिया। अब श्रीरामजीके भक्त इस अमृतसे तृप्त हो लें॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुमंगल खानी॥  
> दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं॥४॥

भावार्थ: राजा भगीरथ गङ्गाजीको लाये, जिन ( गङ्गाजी ) का स्मरण ही सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी खान है। दशरथजीके गुणसमूहोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; अधिक क्या, जिनकी बराबरीका जगत्‌में कोई नहीं है॥ ४ ॥

**दो०** 
> जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।  
> जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥२०९॥

भावार्थ: जिनके प्रेम और संकोच ( शील ) के वशमें होकर स्वयं [ सच्चिदानन्दघन ] भगवान्‌ श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदयके नेत्रोंसे कभी अघाकर नहीं देख पाये ( अर्थात्‌ जिनका स्वरूप हृदयमें देखते-देखते शिवजी कभी तृप्त नहीं हुए )॥ २०९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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