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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 208"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 208

**चौ०** 
> सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥  
> यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥१॥

भावार्थ: सो वह ( श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम ) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिये यह आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजीके पुत्र और श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे भाई हो॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥  
> लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥२॥

भावार्थ: हे भरत! सुनो, श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तीनोंको सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेमके साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती॥ २ ॥

**चौ०** 
> जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा॥  
> तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ॥ ३ ॥

भावार्थ: प्रयागराजमें जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेममें मग्न हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा ही ( अगाध ) स्नेह है जैसा मूर्ख ( विषयासक्त ) मनुष्यका संसारमें सुखमय जीवनपर होता है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥  
> तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू॥४॥

भावार्थ: यह श्रीरघुनाथजीकी बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागतके कुटुम्बभरको पालनेवाले हैं। हे भरत! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजीके प्रेम ही हो॥ ४ ॥

**दो०** 
> तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।  
> राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥२०८॥

भावार्थ: हे भरत! तुम्हारे लिये ( तुम्हारी समझमें ) यह कलङ्क है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है। श्रीरामभक्तिरूपी रसकी सिद्धिके लिये यह समय गणेश ( बड़ा शुभ ) हुआ है॥ २०८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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